भारत को सभ्य बनाने आए अंग्रेज तो असभ्य थे ही क्योंकि उन्होंने पूरी दुनिया में लूटपाट और दमन की ऐसी सभ्यता का विकास किया जिससे मुक्त होने में न जाने कितने वर्ष लगेंगे। लेकिन रामराज्य कायम करने और सनातन धर्म की स्थापना का एक नास्टैलजिया (अतीत मोह) पेश करके संघ परिवार इस सभ्यता के साथ जो कर रहा है वह तो और भी भयानक है।
संघ परिवार का आख्यान इन मान्यताओं पर आधारित था कि भारत में रहने वाला अल्पसंख्यक समाज हिंसक, क्रूर और असभ्य है। उसकी देशभक्ति भी संदिग्ध है। जबकि हिंदू समाज उदार, सभ्य और देशभक्त है। इसलिए हिंदू खतरे में है। इसी के साथ उसका यह मानना है कि समाजवाद, साम्यवाद, समता, स्वतंत्रता और लोकतंत्र और संविधानवाद के विचार विदेश यानी यूरोप से आए हैं इसलिए वे भारत के लिए ग्राह्य नहीं हो सकते।
इन्हीं आख्यानों को आधार बनाकर संघ परिवार महत्त्व और अर्थ की संरचनाओं पर कब्जा करके एक नई सभ्यता का निर्माण करना चाहता है। हालांकि इस दौरान वह यह भूल जाता है कि उसके भीतर नाजियों और फासीवादियों की प्रशंसा का जो भाव भरा है वह कहीं से भी स्वदेशी नहीं है। न ही आज अमेरिका और इजराइल के युद्धोन्मादी नेतृत्व की निकटता एक सभ्यता निर्माण में सहायक हो सकती है।
लेकिन संघ परिवार के सौ साल पूरे होने पर और केंद्रीय सत्ता में लगभग डेढ़ दशक तक बैठने के बाद और देश के अधिकतम राज्यों में सरकार चलाने और कुछ में तो दो दशक तक सत्ता पर कायम रहने के बाद देश का जो साभ्यतिक परिदृश्य बना है वह कहीं से भी सभ्यता की ओर नहीं जा रहा है। बल्कि भारत को असभ्य बनाने और वैश्विक स्तर पर कायम हो रही असभ्यता में सहायक बनने जा रहा है।
मामला महज अयोध्या के राममंदिर में चढ़ावा चोरी(डकैती) का नहीं है, मामला उस पर कुतर्क करने और उसे मैनेज करने का है। संघ के प्रमुख मोहन भागवत तो ‘राम-राम’ कहते हुए भागते दिखे लेकिन उनके दूसरे नंबर के पदाधिकारी दत्तात्रेय होसबोले ने कहा कि हिंदू विरोधी और राष्ट्रविरोधी लोग इसका इस्तेमाल हिंदू आस्था को बदनाम करने के लिए कर रहे हैं उसे रोकने के लिए धैर्य चाहिए।
कहीं ऐसा तो नहीं कि हिंदू समाज के इसी धैर्य ने उसे लंबे समय तक अन्याय के विरुद्ध बोलने और समता और स्वतंत्रता पर आधारित समाज बनाने से रोके रखा। जो समाज अपने आंतरिक अन्याय से लड़कर उसे मिटाने का साहस न कर सके उसे निरंतर असभ्यता के गर्त में जाने से कौन रोक सकता है।
लेकिन असभ्यता का प्रदर्शन अयोध्या तक सीमित नहीं है। वह उस समय भी दिखता है जब दिल्ली से सटे लोनी इलाके में एक मुस्लिम युवक तालाब में नहाने के लिए निकलता है, उसकी बाइक से किसी कार वाले को खरोंच लग जाती है और उसे पीट-पीट कर मार डाला जाता है।
यह प्रदर्शन पश्चिम बंगाल में हुए सत्ता परिवर्तन के बाद विपक्षी दल तृणमूल कांग्रेस के नेताओं के साथ किए जा रहे व्यवहार से भी होता है। नेताओं के कपड़े उतार कर और उनके गले में जूता डालकर घुमाया जाना कौन सी लोकतांत्रिक सभ्यता और संस्कृति का द्योतक है। सांसदों को गिराकर मारना और महिला सांसदों के ऊपर अंडे फेंकना, फिर सत्ता में बैठे लोगों का यह कहना कि अंडे को तो मेटल डिटेक्टर पकड़ नहीं सकता इसलिए नए किस्म की मशीन मंगाई जा रही है कोई हास्य है या असभ्य समाज की निशानी है।
असभ्यता माब लिंचिंग के आरोपियों को सजा देने वाली मध्यप्रदेश के नर्मदापुरम की जज तबस्सुम खान को धमकी देना भी है।
असभ्यता मणिपुर में दो समुदायों को भिड़ाकर उससे दूर हट जाना है, जबकि कुछ साल पहले संघ के लोग यह दावा करते नहीं थकते थे कि उन्होंने पूर्वोत्तर के उग्रवाद और अलगाववाद को नियंत्रित करके वहां के समाज में शांति कायम किया और उन्हें मुख्यधारा में ला दिया है।
असभ्यता फिलस्तीन में 20,000 बच्चों को इजराइली सेना द्वारा निशाना लगाकर मारे जाने पर कोई प्रतिक्रिया न देना भी है। जबकि भारत के ही एक न्यायाधीश ने उस पर अपनी रिपोर्ट में इजराइली क्रूरता को उजागर किया है।
असभ्यता सांसदों और विधायकों की चोरी करना ही नहीं है असभ्यता वोटों की चोरी करना भी है। संघ परिवार के बारे में कर्नाटक के दलित लेखक देवनूर महादेव ने अपनी चर्चित पुस्तक ‘आरएसएस-काया और माया’ में लिखा है कि संघ के लोग ‘मति फेरने और रूप बदलने’ में माहिर होते हैं। उनके इस चरित्र को समझकर ही उनके व्यवहार और सिद्धांत को समझा जा सकता है।
भारत के धार्मिक शहर बहुत अराजक और गंदे रहे हैं। विशेषकर उत्तर भारत में यह प्रवृत्ति धर्म का स्वरूप समझी जाती रही है और कहा जाता रहा है कि इसे धैर्यपूर्वक सहना चाहिए तभी पुण्यलाभ होता है। अयोध्या भी उससे परे नहीं रहा है। अयोध्या की तीर्थयात्रा पर जाने वाले वृद्ध लोग बताते हैं कि किस तरह रास्ते से लेकर शहर के मंदिरों में ठगी का कारोबार था।
मंदिरों की मठाधीशी के लिए तो हत्याएं होना, हिंसा होना आम बात रही है। व्यापक समाज को आशा थी जिस राम मंदिर निर्माण को आजादी के आंदोलन के समतुल्य उपलब्धि के रूप में पेश किया गया उसके बाद बहुत कुछ बदलेगा और एक नई सभ्यता के दर्शन होंगे। लेकिन स्वयं राम मंदिर में व्याप्त अराजकता ने यह प्रमाणित कर दिया है कि संघ परिवार को आर्थिक और राजनीतिक संरचनाओं पर बर्चस्व कायम करने के लिए धर्म का इस्तेमाल करने के अलावा धर्म के मूल्यों को स्थापित करने की रत्ती भर चिंता नहीं है।
अगर संघ वास्तव में चरित्र निर्माण करने में यकीन करता तो उसके बड़े बड़े पदाधिकारी चढ़ावा चोरी में क्यों शामिल होते और वह क्यों कर उनका बचाव करता।
यहीं पर महात्मा गांधी के नेतृत्व में चले स्वाधीनता आंदोलन का साभ्यतिक उद्देश्य स्पष्ट करना चाहिए। गांधी सिर्फ इसलिए नहीं लड़ रहे थे कि अंग्रेज चले जाएं और उनकी जगह पर भारतीय लोगों का शासन आ जाए। वे इसलिए भी लड़ रहे थे कि भारतीयों का चरित्र इतना उज्जवल बने कि उनका शासन अंग्रेजी शासन से एकदम भिन्न हो। इसीलिए गांधी ने सात महापातकों को गिनाते हुए उनसे भारतीयों को सचेत किया था और वे ऐसे लोग तैयार करना चाहते थे जो इन बुराइयों से ऊपर हों।
वे सात महापातक हैः-सिद्धांत के बिना राजनीति, परिश्रम के बिना संपत्ति, विवेक के बिना सुख, चरित्र के बिना ज्ञान, नैतिकता के बिना व्यापार, मानवता के बिना ज्ञान और त्याग के बिना पूजा। आज आप संघ परिवार और उनके आनुसंगिक संगठनों पर दृष्टि डालें तो उनके अपंजीयन से लेकर चोरी और हिंसा की तमाम घटनाओं को देखकर यह सातोंपातक दिखाई पड़ेंगे।
इसका मतलब यह नहीं कि विपक्ष इन सात महापातकों से मुक्त है। विपक्ष अगर नैतिक और साहसी होता तो क्या देश और समाज की ऐसी स्थिति होती। न ही इसका यह अर्थ है कि भारतीय समाज और विशेषकर हिंदू समाज की संरचना इससे मुक्त होने का प्रयास कर रही है। इस समाज में गांव से राजधानी तक सार्वजनिक संपत्तियों को निजी उपयोग में लाने की भयानक बीमारी रही है।
संघ ने उस निजी हित को अपने संगठन के हितों से जोड़ दिया और अपने को किसी जिम्मेदार और जवाबदेह संस्था के रूप में कायम करने के बजाय व्यक्तियों के समूह के रूप में परिभाषित कर लिया। उन्होंने इससे बड़ा पातक यह किया है कि राज्य की जो संस्थाएं स्वायत्त होती थीं और जिनका काम न्याय करना था, उन्हें अपना कारिंदा बना लिया है उनमें अन्याय को ही ऐतिहासिक न्याय के रूप में प्रतिष्ठित किया।
ऐसी स्थिति में नाउम्मीद होने से काम चलने वाला नहीं है। हम न तो राज्य को सड़ने के लिए छोड़ सकते हैं और न ही धार्मिक समुदाय को। गांधी, लोहिया और आंबेडकर इन भी संरचनाओं में हस्तक्षेप करने और उन्हें सुधारने के हिमायती थे। निराशा के इस अंधकार के बीच बांबे हाई कोर्ट के न्यायाधीश माधव जामदार अल्पसंखयक समुदाय के एक राजनीतिक कार्यकर्ता को जिलाबदर करने के फैसले को खारिज करके उम्मीद जगाते हैं।
उम्मीद जगाती हैं नर्मदापुरम की जज तबस्सुम खान जो अपनी जान जोखिम में डालकर माब लिंचिंग के आरोपियों को उम्र कैद की सजा देती हैं। खंडवा के जज अक्षय द्विवेदी भी अपनी सारी सरकारी सुविधाएं त्याग कर आशा जगाते हैं। उम्मीद पैदा करते हैं न्यायमूर्ति एस मुरलीधर जो इजराइल के अत्याचार को बेनकाब करते हुए फिलस्तीनी बच्चों की मौत पर दुनिया की अंतरात्मा को जगाते हैं।
उम्मीद हैं वे युवा जो शिक्षा प्रणाली में धांधली के विरुद्ध काकरोच जनता पार्टी बनाकर जंतर मंतर पर बैठे हैं और उम्मीद जताते हैं कि वे तमाम पत्रकार व सामाजिक कार्यकर्ता जो मुख्यधारा से निष्कासित होने के बावजूद सच को सच कहने का साहस करते हैं। शायद वे ही असभ्यता की ओर जा रही भारतीयता को सभ्यता की ओर मोड़ सकते हैं।
(अरुण कुमार त्रिपाठी वरिष्ठ पत्रकार हैं।)